देश-विदेश

विपक्ष को बड़ा झटका: SC ने SIR को बताया संवैधानिक, करोड़ों वोटरों के नाम हटाने की प्रक्रिया वैध

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: वोटर लिस्ट 'विशेष संशोधन' वैध, 30 मई से 19 राज्यों में शुरू होगी प्रक्रिया

शेयर करें

SIR वोटर लिस्ट सुप्रीम कोर्ट 2026-बुधवार, 27 मई 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया जो देश की चुनावी राजनीति को सीधे प्रभावित करता है। कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) के मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन संशोधन’ (Special Intensive Revision – SIR) को पूरी तरह कानूनी करार दिया है। और यह फैसला तब आया है जब महज़ तीन दिन बाद — 30 मई से — 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में इस प्रक्रिया का तीसरा और अंतिम चरण दस्तक देने वाला है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने दो-टूक शब्दों में कहा:
“SIR निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों की संवैधानिक बाध्यता को कमज़ोर नहीं करता — बल्कि यह अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग के संवैधानिक जनादेश को और मज़बूत करता है।”फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हैं कि SIR के माध्यम से जिस उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश की जा रही है, उसका निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य के साथ सीधा संबंध है।”कोर्ट ने बिहार में शुरू की गई और बाद में अन्य राज्यों तक बढ़ाई गई इस प्रक्रिया को सही ठहराते हुए कहा, “विवादित SIR निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों की संवैधानिक बाध्यता को कमज़ोर नहीं करता है।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों का उल्लंघन नहीं किया। साथ ही एक अहम राहत देते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि स्वीकार्य दस्तावेज़ों की सूची में आधार कार्ड को भी शामिल किया जाए — जिसे पहले चुनाव आयोग ने बाहर रखा था।

SIR है क्या और विवाद क्यों?
जून 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पाँच महीने पहले इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी। इसके तहत उन मतदाताओं को अपनी पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज़ देने होते हैं, जिनके नाम 2002-2003 की वोटर लिस्ट में नहीं थे।

नतीजा? बिहार में 60 लाख और पश्चिम बंगाल में 90 लाख से ज़्यादा नाम सूचियों से हटाए गए। विपक्षी दलों ने इसे “लक्षित मतदाता निष्कासन” करार दिया और आरोप लगाया कि असली मतदाताओं को जानबूझकर बाहर किया जा रहा है।
चुनाव आयोग का पक्ष रहा कि यह केवल वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने और गैर-नागरिकों को मतदान से रोकने के लिए ज़रूरी संवैधानिक अभियान है।
आगे क्या?
30 मई से शुरू होने वाले तीसरे चरण के साथ अब यह प्रक्रिया 19 राज्यों तक फैल जाएगी। सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने के बाद विपक्ष के पास कानूनी रास्ते सीमित हो गए हैं। लेकिन सवाल अभी भी बना हुआ है — क्या यह प्रक्रिया वास्तव में सिर्फ सफाई है, या इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं? जवाब शायद आने वाले चुनावों के नतीजों में मिलेगा।


शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button